poet shire

poetry blog.

Wednesday, August 30, 2017

कलमे की स्याही .



एक स्याही थी खोई सी
एक कलम थी कुछ रोई रोई सी 
कागज़ के कुछ टुकड़े थे बिखरे कोरे से 
अरमान जगे थे जो सोये सोये से 
कुछ तस्वीर जमीं थी आँखों में 
जिनमे लिपट हिये दर्द में  समोए थे 
संगीत बने थे जो निकले थे 
धडकनों की धुन से 
हमने छंद और नगमो में पिरोये थे.

शैलाब  उठा चंचल मन में 
अंजाम ए फ़िक्र से क्या होता है 
नश्वर जग है चंद पलों का,
चंद पलों को हमने आँसू  में खोया है।

नीली नीली स्याही बहती थी,
और  जाने क्या कुछ न कहती थी 
शब्दों का मायाजाल बिखेरे है 
ये कर,क्या करते बस क्रीडा है ??
या मन फिर स्याही की आँसू में रोया है?

Friday, March 3, 2017

ज़िन्दगी का बसेरा

कभी कोहरे है यूँ ज़िन्दगी में
कभी काले बादलों  का घेरा
छणभंगुर खिलखिलाती धुप कभी
कभी नाराज़गी का अँधेरा
न जाने किस ओर छुपा हो
मेरी ज़िन्दगी का बसेरा 

तुम अस्तित्व मेरा

मेरी ज़िंदगी में कविता से भरी एक रोशनी हो तुम
तुम बिन ना कविता है ना रौशनी.
मेरे ज़िंदगी के अस्तित्वा की सचाई है तुमसे जुड़ी
तुम बिन ना अस्तित्वा है ना सचाई


Saturday, February 11, 2017

यादों की कुछ गमगीन शामें




यहाँ है दवा की दुकान
सामने है मौत के फरमान
कुछ तो लोग जैसे
जनाजो के जश्न मानते है
तो कुछ शमशान को अपना घर बनाते है
जोखिम -ऐ - दस्तूर जिंदगी
तो क्या हुआ हम तो मौत को भी
सहोदर की तरह गले लगाते  हैं
हैवान - ऐ- जिल्लत तू  जिंदगी, तो क्या हुआ?
हम तो शोलों  से भी शबनम चुराते हैं


जारी कर दें यम आज की रात
फरमान आखिरी सांसो का
हम तो लहरो पे भी आशियाँ बनाते हैं
हर सांस गिन गिन  कर
तुम्हे ही समर्पित कर जाते हैं

है तन्हाई आज दुल्हन बनके बैठी मेरी
तो क्या हुआ?
हम झींगुरों से शहनियां बजवायेंगे
खामोशियों की बारात सजाकर  ले आएंगे
तन्हाई को आज हम हमसफ़र बनाएंगे


कुछ गुफ्तगू यु अधूरे  रह जायेंगे
हमने जगती रातों में सोचा न था
इंतज़ार हर भोर को किया हमनें जाने कितनी
शामों का



काली घनेरी चादर पे बिछ जाते  हैं तारे तमाम
याद आ जाती है कुछ अधूरे से  अरमान
हम हर अरमानों के तिनको से
अधूरी आरजुओं को जोड़ कर
एक घर बनाएंगे
घर का हर कोना
तुम्हारी ही यादों से सजायेंगे

Friday, October 21, 2016

                                                         

 T Path

Standing at a ‘T’ junction,
Observing the fate of trials
Writ of karma
What may decree?
From the brink of success
To path of failures
Converged to roads
Thus traveled,
Less mattered.

A road that never ends
With breathing dust for livings
And the cruise of wanders

A road becomes home
While,
Chasing the horizons
Of dawn
And
Of dusk
Some skies white
All of the night
Some dark
All through the day

Some drops are left
On the brink of my eyes
A drop shines saffron
An offering to the Sun


Feeling and realizing the love of Mother Nature
The craze and smog of ambiances
Ambitions, passions and enthusiasms,
When Cuddles with mother earth
A spirit awakens,
From the sleep of ignorance. 

Tuesday, December 17, 2013

संगिनी

     


                                            बलैइयाँ उतारतीं हैं
ये निशा अपने रंग से
जो घटा सावन की
छ्टा छ्ट रही है कुछ
पावस की हल्की फूलकारियों से
ये बूँदें बन गयी है
जो छलक पड़ी है कुछ पहले
जब जग सोना हो दो पल को .

कहीं ये शाम फिर से
शबनमी ना हो जाए
इन बयारों की मस्ती मे
मधम मधम
जो बह चली फिर
आँधियारे से कुछ पहले
संग संगिनी बनके

तन मन बहकाने को.

Monday, May 27, 2013

तन्हाई |




आज भी घनी दोपहर में
लू की तन उधेड़ती थपेड़ों में
धूल भरे खेतों से आगे
कहीं रेगिस्तान बने मैदानों में
है कराहती एक पोखर
तरस रही है दो बूँद पानी को।
उसी पोखर में,
एक मीन प्यासी बिलख रही है
दो बूँद पानी से सनी मिट्टी में।
उस हल्की सी भीगी मिट्टी से,
एक सौंधी सी खुश्बू उड़ चली है,
एक शामियने में 
जहाँ आज भी बैठी है
तन्हाई मेरी दुल्हन बनकर।

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